पर्यावरण प्रदूषण से पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं ज्यादा होती हैं प्रभावित

लखनऊ। पर्यावरणीय प्रदूषण वैविक स्तर पर होने वाली विभिन्न बीमारियों और उनके कारण होने वाली मौतों का प्रमुख कारण बन चुका है। इसमें पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं ज्यादा प्रभावित हैं। खास तौर पर विकासशील देशों में जैसे कि हर साल भारत में लगभग 45००० महिलाओं की मृत्यु गर्भकाल एवं प्रसव के दौरान हो जाती है जबकि इन सारी मौतों को टाला जा सकता है। कुछ ऐसी ही पहलुओं पर एमिटी विश्वविद्यालय लखनऊ कैम्पस में चल रहे इम्पैक्ट ऑफ इनवार्यमेंट ऑन वूमेन्स हेल्थ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन पर चर्चा हुई। जिसमें तमाम शिक्षाविद् और शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। इसके पूर्व एमिटी विश्वविद्यालय लखनऊ परिसर की डीन शोधकार्य, विज्ञान एवं तकनीकि प्रोफेसर कमर रहमान ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि, यह सम्मेलन न सिर्फ पर्यावरण की बिगड़ती सेहत और समस्त मानव जगत पर पड़ने वाले इसके प्रभावों पर गंभीर चर्चा करने का एक मौका प्रदान करेगा बल्कि इसमें सुधार के नए रास्तों पर भी रोानी डालेगा।   इस दौरान एक विश्ोष दीक्षांत समारोह का आयोजन किया गया जिसमें एमिटी ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूानस् के संस्थापक अध्यक्ष डा. अशोक के चौहान और एमिटी विवविद्यालय लखनऊ परिसर के चेयरमैन डा. असीम के चौहान ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इनवार्यन्मेंटल हेल्थ साइंसेज एण्ड नेशनल टाक्सिीकोलाजी प्रोग्राम, नार्थ कैरोलीना, यूएसए की निदेशिका डा. लिंडा ब्रिंबम, कोलम्बिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर टॉम वी., रोस्टक यूनिवर्सिटी, जर्मनी के प्रोफेसर वॉल्फगैंग शैरेक, माउंट सनाय हास्पिटल यूएसए के प्रोफेसर मोने जैदी और जर्मनी की प्रोफेसर पीटर लैंगर को डॉक्ट्रैट की मानद उपाधि प्रदान की।

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