भीमाकोरे गांव की घटना से साबित हुआ कि दलित हिन्दू नही-एमसी विमल

1 जनवरी 2०18 भीमा कोरे गांव की घटना ने एक बार फिर से ये बता दिया है कि दलितों तुम हिन्दू नही हो। ये बात हिन्दू मीडिया ने भी चिल्लाकर चिल्लाकर कहा है कि कोरेगांव में हिन्दू घ् दलितों का संघर्ष है। इस घटना से उन दलितों को सोचना है कि क्या हमें हिन्दू लोग सहर्ष सम्मान और स्वाभिमान के साथ स्वीकार करते हैं? अगर नहीं तो फिर उन्हें सोचना है कि फिर क्या किया जाये? और हम कहां जायें? जहां सम्मान के साथ रह सके। दलित वर्ग जानता है पूना पैक्ट के तीसरे वर्ष में बाबा साहब अंबेडकर ने हिन्दू धर्म त्यागने की घोषणा कर दी थी। और 21 वर्ष गहन चिंतन, अध्ययन के बाद उन्होंने दुनिया के श्रेष्ठ वैज्ञानिक बौद्ध धर्म को स्वीकार किया था। जब भारत में बौद्धों की संख्या लाखों में नहीं थी।
आज भी बाबा साहेब के दो प्र्रकार के अनुयायी है
भारत में बाबा साहब के अनुयायी दो प्रकार के हैं। एक तो वह हैं जो बाबा साहेब की देसना, आदेश को सुनकर बौद्ध हो गये और बौद्ध होने के साथ-साथ बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार कर रहे हैं। जिससे देश बौद्ध धम्म की ओर मुड़ सके। और बाबा साहेब का अन्तिम सपना बौद्ध मयी भारत बनाना साकार हो सके। दूसरे बाबा साहब के वो मिशनरी हैं जो बाबा साहब संघर्ष, उनकी उपलब्धियां उनके उपकारों की तारीफ करते फिरते हैं, बाबा साहेब की प्रतिमा पर फूल मालाय्ों चढ़ाते हैं और जय भीम करते हैं। लेकिन हिन्दू धर्म में रहकर अपनी जाति पर अभिमान करते हैं और जाति व्यवस्था से बाहर होना नहीं चाहते हैं। उनका मानना है कि हमारा संघर्ष जारी रहेगा। जिसका कोई अंत नहीं है। इन दोनो प्रकार अनुयाईयों पर चर्चा करने के बाद बाबा साहेब के जीवन मिशन को जानना होगा।
कोरेगांव जैसा बाबा साहेब के साथ भी हुआ था
तो मित्रों, बाबा साहेब ने अपने लोगों को समझाने के लिए महाड़ तालाब और कालाराम मंदिर प्रवेश का आंदोलन चलाया था। उसमें बाबा साहेब का भी 1 जनवरी 2०18 कोरेगांव जैसा हाल हुआ था। इन घटनाओं से साफ-साफ जाहिर है दलित हिन्दू नहीं है। मीडिया ने भी भीमा कोरेगांव को हिन्दू और दलितों का संघर्ष कहा है कि दलित हिन्दू नहीं है। यही बात बाबा साहेब अपने लोगों को समझाना चाहते थ्ो कि दलित हिन्दू नहीं है। बल्कि मुसलमानों की तरह एक अलग वर्ग है। इसी बात को वह अपने मराठी भाईयों को समझाने में सफल हुए। उसी का परिणाम था कि अंग्रेजों ने उन्हें गोलमेज सम्मेलन में दलित प्रतिनिधि के रूप में इंगलैंड में आमत्रिंत किया और दूसरे गोलमेज सम्मेलन में बाबा साहेब ने दलितों के लिए डबल वोट (दो वोट)देने का अधिकार प्राप्त किया।
गांधी जी ने डबल वोट को लेकर किया था अनशन
इसी डबल वोट के अधिकार को मोहनदास करम चन्द्र गांधी जी ने सुना तो उन्होंने पूना की यदर्वा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया कि मैं दलितों को ऐसा कोई अधिकार देने के पक्ष में नही हूं। गांधी जी का आमरण अनशन का अंत ही पूना पैक्ट है। जिसमें दलितों को अनेक अधिकारों के साथ-साथ छुआछूत, ऊंचनीच, जातपात को भी खत्म करने को पैक्ट में लिखा गया। ( यहां हम बता दें अगर गांधी जी अनशन न करते तो आज दलितों की छवि ही अलग होती। जातिपात, छुआछूत का भ्ोदभाव अमेरिका नीग्रो लोगो की तरह हमेश हमेशा के लिए मिट गया था, जो आज भी जिंदा है।)
अंत में इसलिए धर्म छोड़ने की बाबा साहब ने की घोषणा
तीन साल तक (1935) बाबा साहेब ने पूना पैक्ट को लागू करने वालों की नियत को देखते रहे। अंत में उन्होंने ये जान लिया कि हिन्दू लोग दलितों को भला करने वाले नहीं तो 13 अक्टूबर 1935 में हिन्दू धर्म को त्यागने की घोषणा कर दी। उस समय बाबा साहेब बंबई विधानसभा में विधायक थ्ो। (बाबा साहेब 1927 से 1939 तक विधायक रहे)

21 वर्ष तक भारत के धर्मों का गहन चिंतन और अध्ययन के बाद उन्होंने दुनियां के श्रेष्ठतम वैज्ञानिक बौद्धधर्म को 14 अक्टूबर 1956, नागपुर में स्वीकर कर कहा मेरा पुर्नजन्म हो गया है ऐसा बाबा साहेब कहते हैं।

लेखक- धम्मघोष के प्रकाशक हैं वह वरिष्ठ साहित्कार और बौद्ध विचारक हैं।
एमसी विमल लखनऊ-9415793577

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