पढिए- शाहजहां पुर में क्यों खेेेेली गयी जूतामार होली? और वारणासी की होली में क्यों हुआ चिता की भस्म का इस्तेमाल

लखनऊ। वैसे तो देश भर में होली का पर्व बड़ी धूमधाम के साथ सुबह से मनाया जा रहा है। लोग एक दूसरे को गुलाल लगाकर होली की बधाई दे रहे हैं तो गुझिया खिलाकर लोगों का मुंह भी मीठा किया जा रहा है। इस होली के पर्व पर हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई भी साथ-साथ नजर आ रहे हैं। लेकिन यूपी के शाहजहां पुर और वारणासी में एक अजग-गजब ढंग से होली ख्ोली गयी। जिसमें शाहजहां पुर में जूतामार होली ख्ोली गयी तो वहीं वाराणसी में चिताओं की भस्म को एक दूसरे के लगाकर होली का पर्व मनाया गया। वैसे माना जाता है शाहजहां पुर में जूतामार होली की परम्परा वर्षों पुरानी है।
वैसे तो शाहजहां पुर की ये होली पूरे देश भर में मशहूर है। शुक्रवार को होली के पर्व पर हर साल की तरह यहां पर एक फिर जूतामार होली ख्ोली गयी। लाटसाहब को जूतों से पीटा गया तो गिफ्ट में उन्हें शराब की बोतल भ्ोंट गयी। हालांकि अभी तक फूलो की होली, लठ्ठ मार होली, अबीर गुलाल की होली और लड्डू मार होली तो लोग अधिकांश जगहों पर मनायी जाती है लेकिन जूतामार होली शाहजहांपुर में ही मनायी जाती है।

इसलिए मनायी जाती है जूतामार होली
शाहजहां पुर मे ंजूतमार होली ख्ोले जाने की एक मुख्य वजह यह है कि हर साल होली के दिन लोग अंग्रेजो के प्रति अपना गुस्सा प्रगट करते हैं। इसके लिए यहां क लोग एक लाट साहब नाम से जुलूस निकालते हैं। एक व्यक्ति को लाटसाहब बनाकर भ्ौंसा गाड़ी पर बैठाया जाता है, फिर उसे जूते से पीटते हुए ले जाते हैं। हालांकि जूता इतनी व्यक्ति को सिर्फ छुवाया जाता है। दरअसल अंग्रेजो ने जो कभी भारत के लोगों पर अपना जुल्म किए थ्ो, उसे कभी भी भुलाया नही जा सकता है।

लाट साहब को पूरे शहर भर में घुमाया जाता है
लाट साहब पर झाडूं का भी इस्तेमाल किया जाता है इस दौरान पूरे शहर में उनको घुमाया जाता है। लाट साहब बिना कपड़े ही भ्ौंसा गाड़ी पर बैठते हैं उन्हें सिर्फ एक पॉलीथीन की चाद से ढका जाता है। इस दौरान बच्चे बूढे युवा सभी इस होली में बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

शाहजहां पुर के इन दो शहरों मे मनायी जाती है जूतामार होली
वैसे तो पूरा शाहजहां पुर दो शहरों की वजह से जूतामार होली के नाम पर मशहूर है। उसमें पहला बड़ा चौक और दूसरा सराय कााईया है। यहां जब लोग जूतामार होली मनाते हैं तो पुलिस प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती भी होती है। किसी भी प्रकार की गड़बड़ी न होने पाये इसे लिए इसके लिए पुलिस प्रशासन पूरी तरह से मुस्त्ौद रहता है।

वाराणासी में चिता की भस्म से भी खेेेेली गयी होली

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वाराणसी-लखनऊ। वाराणासी में हर जगहों की तरह यहां भी अबीर गुलाल से होली ख्ोली गयी। लोगों ने एक दूसरे के गले मिलकर अबीर गुलाल लगाकर होली की बधाई दी। लेकिन यहां के औघड़ शिव के भक्तों ने चिता की भस्म को एक दूसरे के लगाकर होली की बधाई दी। शिव भक्त अवघड़ों ने श्मशान पर चिता की राख से होली ख्ोली। दाहसंस्कार बाद शोक में डूबे लोगों ने संगीत भी देखा चिताओं के पास तमाम तरह के म्यूजिक यंत्रों के जरिए संगीत को प्रस्तुत किया गया। अवघणों ने तबदलो की थाप और हारमोनियम की धुन पर इस होली को खेला। ये होली हर साल काशी के मणिकार्णिका घाट पर खेली जाती है।

होली के सामय ऐसा हो जाता है नजारा
होली के समय यहां का नजारा पहली बार देखने वालों के लिए आश्चर्य भरा हुआ होता है। देश के विभिन्न हिस्सों से दाहकर्म के लिए घाट पर जुटे लोग आश्चर्य भरी नजरों से पूरे माजरे को देखते रहे। होली के पहले किसी अपने को खोने का दुख भूल कर वह भी कुछ देर के लिए चिताभस्म की होली का हिस्सा बन गए। इससे पूर्व श्मशानेश्वर महादेव की विधान पूर्वक अर्चना की गई।

ऐसी होली ख्ोलने के पीछे ये है मान्यता
बताया जाता है कि रंगभरी एकादशी के दिन मात पार्वती का गौना कराने के बाद अगले दिन भगवान शिव ने महाश्मशान पर जाकर भूतों-प्रेतों और गणों सहित वहां निवास करने वाली कई अदृश्य शक्तियों के साथ चिता भस्म की होली खेली थी। काशी के संन्यासी और औघड़ संत उसी स्मृति को ध्यान में रख कर मसान पर चिता भस्म से होली खेलते थे। यही कारण है कि इस परंपरा को वर्षों से मनाया जाता है।

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