53 साल पुरानी प्रार्थना अचानक कैसे सांप्रदायिक हो गयी?, ये है मामला

डेस्क न्यूज। देश के केन्द्रीय विद्यालयों में पिछले 53 सालों से जो बच्चों से प्रार्थना करायी जा रही थी वह अब अचानक सांप्रदायिक और अंसवैधनिक हो गयी है। जी हां सुप्रीम कोर्ट में एक प्रार्थना को लेकर ऐसी ही याचिका दायर की गयी है। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उस प्रार्थना पर अब भारत सरकार से जवाब मांगा है। साथ ही कोर्ट ने याचिका कर्ता की ओर से सरकार से पूछा है कि क्या हिन्दी और संस्कृत में होने वाली प्रार्थना से किसी धार्मिक मान्यता को बढ़ावा मिल रहा है? ऐसे में अब सरकार को जवाब देना है।

फिलहाल सरकार का जवाब कोई भी हो या फिर अब कोर्ट इस पर जो भी निर्णय ले वह अलग की बात है। लेकिन सवाल यह है कि 53 सालों से हो रही ये प्रार्थना अचानक कैसे सांप्रदायिक हो गयी? कोर्ट में याचिका के बाद अब बाहर कई सवाल खड़े हो रहे हैं? जिस पर भी गौर करने की जरूरत है।

सवाल नम्बर1- कहीं ऐसा तो देश को तोड़ने के लिए एक बड़ी साजिश रची जा रही है?
सवाल नंबर 2- भाजपा सरकार को हिन्दुत्व के नाम पर देश कुछ समुदाय के लोग घ्ोरने की तैयारी कर रहें हैं?
सवाल नंबर 3-अगर अब ये प्रार्थना सांप्रदायिकता का महौल बना रही है तो पहले क्या होता रहा है?
सवाल नंबर 4-53 सालों बाद ही इस प्रार्थना के बारे में क्यों सवाल उठा इससे पहले कोई आपत्ति क्यों नहीं?
सवाल नंबर 5- इसी प्रार्थना को सभी बच्चे गाते रहें उसके बाद उनमें एकता का भाव है तो अब साम्प्रदायिक कैसे?
सवाल नंबर 6- सबसे बड़ा सवाल है कि अब तक जो सरकारे जा चुकी हैं उनको भी प्रार्थना के लिए कटघरे में खड़ा किया जायेगा?

नोट- ऐसे कई सवाल और भी हैं जिनका जवाब मुश्किल हैं। क्योंकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कहीं ऐसा तो नहीं देश में किसी बड़े मुद्दे से ध्यान हटाने की साजिश तो नहीं हो रही?

इस प्रार्थना पर उठाया जा रहा है सवाल
असतो मा सदगमय॥

तमसो मा ज्योतिर्गमय॥

मृत्योर्मामृतम् गमय ॥

इसका अर्थ ये है कि असत्य से सत्य की ओर चल्ो और हमकों अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो। अब इसमें सांप्रदायिकता कहां पर है?

इस पर भी गौर करनें की जरूरत है
दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना,

दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना।

हमारे ध्यान में आओ, प्रभु आंखों में बस जाओ,

अंधेरे दिल में आकर के परम ज्योति जगा देना।

बहा दो प्रेम की गंगा, दिलों में प्रेम का सागर,

हमें आपस में मिलजुल के प्रभु रहना सिखा देना।

हमारा कर्म हो सेवा, हमारा धर्म हो सेवा,

सदा ईमान हो सेवा, वो सेवक चर बना देना।

वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना,

वतन पे जां फ़िदा करना, प्रभु हमको सिखा देना।

दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना,

दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना।

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