लखनऊ विश्वविद्यालय के 6० वें दीक्षांत में मानद उपाधि मिलते ही राजनाथ सिंह ने की ऐसी बात

लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय का शनिवार को 6० वां दीक्षांत समारोह बड़ी धूमधाम से मनाया गया। इस दौरान जहां मेधावी छात्र-छात्राओं को सम्मानित किया गया, साथ में केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिह को डाक्टेरट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एवं राज्यपाल राम नाईक ने गृहमंत्री राजनाथ सिह को जैसे ही मानद उपाधि दी। तुरंत राजनाथ सिह ने कहा कि मैने कुलपति से आग्रह किया था कि अच्छा हो कि उन्हें यह उपाधि नहीं दी जाए क्योंकि मैं खुद को इस उपाधि के योग्य नहीं मानता। पर, कुलपति ने कहा कि राज्यपाल का आदेश है। व्यवस्था में विश्वास करने का मूल स्वभाव होने के कारण मैं उनके आग्रह को टाल नहीं सकता। उन्होंने कहा कि जीवन में व्यक्ति का कद उसके कर्मों से बड़ा होता है न कि किसी उपाधि या पद से बड़ा होता है। उन्होंने इस दौरान युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि राजनीति की विसंगतियों और कथनी करनी में अंतर से ऊबकर भागना नहीं चाहिए। इसमें हिस्सा लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि युवाओं को विकास की राजनीति में सक्रिया होना चाहिए, साथ ही विश्व गुरु बनाने में हाथ बंटाना चाहिए। इस मौके पर राज्यपाल राम नाईक ने 32 छात्रों और 159 छात्राओं सहित 191 विद्यार्थियों को पदक प्रदान किए। समारोह के दौरान उप मुख्यमंत्री डा. दिनेश शर्मा भी उपस्थित रहे।
मर्यादा के महात्व को समझना जरूरी
गृहमंत्री ने कहा कि मर्यादा के महात्व को समझना बेहद जरूरी है, इसे कभी नहीं तोड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं देश का गृहमंत्री होते हुए भी कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता। कहा कि रावण राम से ज्यादा धनवान, बलवान और ज्ञानवान था। पर, दुनिया में रावण की पूजा नहीं होती तो उसका एकमात्र कारण उसके द्बारा मर्यादाओं का पालन न करना ही था, भगवान राम की पूजा इसलिए होती है क्योंकि उन्होंने हमेशा मर्यादा का ध्यान रखा। मर्यादा का पालन केवल प्रिय ही नहीं बल्कि पूज्य भी बनाता है। इसलिए जीवन में संस्कार और मर्यादा पर विशेष ध्यान देना चाहिए। शिक्षा और ज्ञान ही मनुष्य के जीवन में पर्याप्त नहीं है। मनुष्य के जीवन में संस्कार और मूल्यों का होना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। ज्ञान संस्कार के साथ जुड़कर समाज के लिए कल्याणकारी होता है।
व्यवस्था के खिलाफ खुली टिप्पणी से बचना चाहिए
गृहमंत्री ने छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि व्यवस्था के खिलाफ सार्वजनिक टिप्पणी बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यवस्था के खिलाफ लड़ना नौजवानों का स्वभाव होता है। पर, यह ध्यान रखना चाहिए कि व्यवस्था एक दो दिन या साल दस साल में नहीं बनतीं। व्यवस्थाएं बनने में लंबा समय लगता है। कभी भी व्यवस्था के खिलाफ ऐसी सार्वजनिक टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।
माता पिता के साथ गुरु का नाम होने से गृहमंत्री ने कर दी खिचाई
गृहमंत्री राजनाथ सिह कहा कि हमें कुलपति के भाषण में कोई भी त्रुटि निकालने का अधिकार नहीं है लेकिन कुलपति के दीक्षोपदेश में माता पिता के साथ गुरु का नाम न होना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि जीवन में माता-पिता के साथ गुरु का भी कम महत्व नहीं है। गुरु से ही व्यक्ति को संस्कार मिलता है। पर, दीक्षोपदेश में पता नहीं किन कारणों से गुरु का नाम नहीं है। मनुष्य के जीवन में व्यक्ति या समाज के साथ भावना का रिश्ता होता है। भविष्य में दीक्षांत समारोह में माता-पिता के साथ गुरु का भी नाम रहे तो ठीक रहेगा। हालांकि राज्यपाल ने प्रिटिंग में गड़बड़ी का हवाला देकर सफाई भी दी।

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