महिला हिंसा को रोकने के लिए सिर्फ जागरुकता ही काफी नहीं जिम्मेदारी भी समझनी होगी-अभिलाषा चौधरी

लखनऊ। आज पूरे भारत समेत विश्वभर में अंतर्राष्टï्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाया जा रहा है, महिला हिंसा को हर हाल में रोका जाये इसके लिए तमाम तरह के जागरुकता अभियान भी चलाये जा रहे हैं, इस मुद्दे पर कई सारे एनजीओ काम कर रहे हैं, यहां तक सरकारे भी आती जाती रही हैं , क्या किसी ने सोचा है कि आजादी के इतने सालो बाद भी एक नारी के सम्मान के प्रति हम कितना सजग है और कितनी जिम्मेदारी हमारी बनती है, हर साल एक दिवस के रूप में ही इसे मनाने से काम नहीं चलेगा बल्कि घर से लेकर बाजार तक हर जगह पर जिस दिन महिला को एक सम्मान की दृष्टि से देखा जाये तो तब समझा जा सकता है कि हमारा
अभिलाषा चौधरी वरिष्ठ लेखिका
अंतर्राष्टï्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाया जाना सफल हुआ है। इस बात को भी हमें बखूबी समझना होगा आज हर क्षेत्र में महिलाएं अपनी भूमिका निभा रही हैं। जमीन ही नहीं आंतरिक्ष में भी अपनी प्रतिभा का परचम लहराया है। जिस तरह से महिलाएं अपने कदम आगे बढ़ा रही हैं, वह अपने हक और कानूनी अधिकार भी समझ रही हैं, लेकिन इस तरह की जागरुक महिलाओं का प्रतिशत कम है, कोई दिवस मात्र महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा को खत्म नहीं कर सकता है, हां जारुकता लाकर इसमें कमी की जा सकती है। अभिलाषा चौधरी की रिपोर्ट 
महिला हिंसा से बच्चो और परिवार पर पर पड़ता है असर
यदि महिला हिंसा होती है तो उसका इफेक्ट कहीं न कहीं परिवार और बच्चो दोनो पर ही पड़ता है, वह महिला फिर चाहे बहन के रूप में हो, मां के रूप में हो, पत्नी के रूप में हो या फिर ताई या बुआ के रूप में हो। बच्चों के सामने जब महिला के प्रताडऩा के मामले होते हैं तो बच्चों पर इसका नकारात्मक फर्क देखने को मिलता है। ऐसे में बच्चों को स्कूल से मिलने वाली नैतिक शिक्षा भी प्रभावित होती है। इस स्थिति में बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं उन पर लगातार नकारात्मक प्रभाव पड़ते जाते हैं। अंत में पूरे परिवार को भी गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
महिलाओं को जानने होंगे अपने कानूनी अधिकार
आज शिक्षा के क्षेत्र में महिलाएं भले ही आगे हैं लेकिन कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में महिलाएं पीछे हैं, अधिकांश महिलाओं केे अपने अधिकार नहीं पता होते हैं फिर वह मानसिक प्रताडऩा का भी शिकार होती है। महिलाओं की जागरुक करने में सामाजिक संस्था और एनजीओ और राजनैतिक पार्टियां अपनी अहम भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि कई सारे एनजीओ और संस्थाएं ऐसे मुद्दों को लेकर खानापूर्ति करते ही देखे जाते हैं।
                                               नारी तू कमजोर है, तबतक तूने माना है
                जब भी उठ खड़ी हुई जमाना हार माना है
                                           लेकर दुर्गा का रूप तूने ही तो राक्षसों को मारा है
              सत्यवती भी तो नारी थी, जिसके आगे यमराज भी हारा है।
विकासशील देशों में सबसे अधिक महिला उत्पीडऩ का शिकार
विश्व महिला हिंसा-उन्मूलन दिवस पर हिंसा एवं उत्पीडऩ से ग्रस्त समाज की महिलाओं पर विमर्श जरूरी है, क्योंकि विकसित एवं विकासशील देशों में महिलाओं पर अत्याचार, शोषण, भेदभाव एवं उत्पीडऩ के अधिक मामले सामने आये हैं, जोकि अपने में एक बेहद अफसोस जनक है। हालांकि भारत सहित दुनियाभर में अल्पसंख्यक और संबंधित देशों के मूल समुदाय की महिलाएं अपनी जाति, धर्म और मूल पहचान के कारण बलात्कार, छेड़छाड़, उत्पीडऩ और हत्या का शिकार होती हैं। वहीं माइनॉरिटी राइट्स गु्रप इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के अल्पसंख्यकों और मूल लोगों की दशा’ नामक अपनी सालाना रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे दुनिया भर में अल्पसंख्यक और मूल समुदाय की महिलाएं हिंसा का शिकार ज्यादा होती हैं, चाहे वह संघर्ष का दौर हो या शांति का दौर। इस संगठन के कार्यकारी निदेशक मार्क लैटिमर ने कहा कि दुनियाभर में अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव के तहत महिलाओं को शारीरिक हिंसा का दंश झेलना पड़ता है। युद्ध और शांति दोनों वक्त अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को निशाना बनाया जाता है क्योंकि वे कम शिक्षित एवं सुरक्षित होती हैं और वे शिकायत नहीं कर पाती हैं। यह स्थिति भारत के सन्दर्भ में भी भयावह है।

महिलाओं के प्रति जघन्य अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए कठोर कदम उठाना जरूरी
आम महिलाओं और युवतियों की ही भांति अल्पसंख्यक समाज की महिलाओं पर भी कहीं एसिड अटैक हो रहे हैं, तो कहीं निरंतर हत्याएं-बलात्कार हो रहे और कहीं तलाश-दहेज उत्पीडऩ की घटनाएं हो रही हैं। इन घटनाओं पर कभी- कभार शोर भी होता है, लोग विरोध प्रकट करते हैं, मीडिया सक्रिय होता है पर अपराध कम होने का नाम नहीं लेते क्यों? बल्कि ये वह जघन्य अपराध होते हैं जिनके लिए माफी नाम का कोई शब्द नहीं होना चाहिए, ऐसे अपराधों के प्रति न्यायालयों को भी अपनी अहम भूमिका निभानी चाहिए और ऐसे मामलों का निस्तारण भी जल्द से जल्द होना चाहिए।

नारी को छोटा और कमजोर समझने की बदलनी होगी मानसिकता
दिल्ली में निर्भया रेपकांड के बाद इंसाफ मांग रही महिलाओं का इस तरह से पुलिस ने किया स्वागत
भारतीय समाज में देखा जाये आजादी के आज 72 सालों बाद भी नारी को कमजोर ही समझा जाता है। इसको लेकर हम आज भी समाज की एक ही जैसी मानसिकता है। यही कारण है कि महिला के प्रति होने वाले अपराध थमने का नाम नहीं लेते हैं। वह चाहे मीटू जैसे आन्दोलनों से हो या निर्भया कांड के बाद बने कानूनों से। इसलिए ऐसे अपराध पूरे न सही लेकिन फिर भी काफी सामने आने लगे हैं। अन्यायी तब तक अन्याय करता है, जब तक कि उसे सहा जाये। महिलाओं में इस धारणा को पैदा करने के लिये न्याय प्रणाली और मानसिकता में मौलिक बदलाव की भी जरूरत है।

यूरोपीय संघ की रिपोर्ट के मुताबिक संयुक्त राष्ट के लिए गंभीर है हिंसा का विषय
-35 प्रतिशत महिलाएं शारीरिक यौन हिंसा का शिकार नान पार्टनर के द्वारा होती है
-एक अध्ययन में यह भी पता चला कि 70 प्रतिशत एक अंतरंग साथी से प्रताडि़त हैं
-सभी मानव तस्करी के मामलों 51 प्रतिशत महिला या बच्चियां शिकारा हैं
-हर 10 महिलाओं में से एक 15 साल की उम्र से ही उत्पीडऩ का शिकार
-18 से 29 वर्ष की आयु के बीच युवा महिलाओं में जोखिम सबसे अधिक है।
-70 प्रतिशत महिलाओं की संख्या अपने जीवनकाल में हिंसा का अनुभव करती है।

इस तरह से महिलाएं और बेटियां हैं शिकार
-महिलाओं का यौन उत्पीडऩ किया जाना
-समाज में फब्तियों से रूबरू होना
े-आये दिन छेडखानी के मामले
– वैश्यावृत्ति में कीमत चुकाने के बाद भी शोषण
-गर्भाधारण के लिए विवश करना
– महिलाओं और लड़कियों को खरीदना और बेचना
इसलिए मनाया जाता है ये दिवस
25 नवंबर 1960 के दिन डोमिनिकन शासन के राजनैतिक कार्यकर्ता राफेल ट्रुजिलो के आदेश पर 3 बहनों – पैट्रिया मर्सिडीज मिराबैल, मारिया अर्जेंटीना मिनेर्वा मिराबैल तथा एंटोनिया मारिया टेरेसा मिराबैल की बेहद क्रूर तरीके से हत्या कर दी गई थी। दरअसल, इन तीनों बहनों ने ट्रुजिलो की तानाशाही का विरोध किया था। 1981 से तीनों बहनों की मौत के बाद हर साल महिला अधिकारों के समर्थक इस दिन को श्रृद्धांजलि दिवस के रूप में मनाने लगे। 17 नवंबर 1999 को संयुक्त राष्ट्र ने 25 नवंबर का दिन अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस के रूप में घोषित कर दिया।

इन पदों पर पहुंच कर महिलाओं ने पहले स्थान पर फहराया पराचम

  • -अंतरिक्ष में जाने वाली पहली भारतीय महिला कल्पना चावला.
  • -एशियाई खेलों में मुक्केबाजी में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला एम.सी. मैरी कॉम.
  • -कान्स में जूरी सदस्य बनने वाली पहली भारतीय अभिनेत्री ऐश्वर्या राय.
  • -ओलंपिक खेलों में रजत पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला पी.वी. सिंधु.
  • -ओलंपिक के फाइनल में पहुंचने वाली प्रथम भारतीय महिला पी.टी. उषा.
  • -महिला टेनिस संघ (डब्ल्यूटीए) डबल रैंकिंग में पहले स्थान पर काबिज होने वाली पहली भारतीय महिला सानिया मिर्जा.
  • -ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल
  • -ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान साक्षी मलिक
  • -रियो ओलंपिक में क्वालीफाई करने वाली पहली महिला जिम्नास्ट दीपा करमाकर.
  • -पहली ऑटो-रिक्शा चालक शीला दावरे-1988 में रूढ़िवादी मान्यताओं को झुठलाते हुए ऑटो-रिक्शा चलाना शुरू किया.
  • -मास्टर शेफ इंडिया जीतने वाली पहली भारतीय महिला पंकज भदौरिया.
  • -माउंट एवरेस्ट पर चढऩे वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल.
  • -मिस अर्थ का खिताब जीतने वाली पहली भारतीय महिला निकोल फारिया.
  • -पैरालंपिक खेलों में पहला पदक जीतने वाली भारतीय महिला दीपा मलिक.
  • -द्रोणाचार्य पुरस्कार से नवाजी जा चुकीं पहली भारतीय महिला क्रिकेट कोच सुनीता शर्मा।
  • -नकद रहित भुगतान कंपनी की नींव डालने वाली पहली महिला उपासना टाकू.
  • -भारतीय सेना की पहली महिला पैराट्रपर (एएमसी) लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) जे.फरीदा रेहाना 1964 में भारतीय सेना में शामिल हुई थीं
  • -भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी

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