भाग 2- छुआछूत की समस्या ही वर्ग कलह है-एमसी विमल

M.C Vimal

देश में जाति एक ऐसा विष है जो छुआछूत और भेदभाव को कम नहीं होने देर रहा है। चाइना और जापान व अमेरिका की प्रगति को देखते हुए आज हमें इस जाति बंधन पर गहरा विचार करना होगा तभी हम इनकी तरह विकास की लाइन में खड़े हो सकते हैं। ये कड़वा सत्य है जिसे स्वीकार करना ही होगा। हम जैसा की वर्तमान में देख पा रहे हैं कि कभी एक फिल्म को लेकर एक जाति के लोग सड़क पर आ जाते हैं तो कभी कभी तिरंगा फहराने को लेकर दो समुदाय भिड़ जाते हैं, इसी तरह से महाराष्ट हिंसा को भी देखा जा सकता है। ऐसे मामलों के आ जाने से विकास पर ग्रहण लग जाता है। विकास के मुद्दे से भी लोग भटक कर जातपात में उलझे रहते हैं। अब समय आ गया है कि हम सब इस पर मिलकर जनहित पूरे देशहित में विचार करें। 

जाति व्यवस्था के भीतर रहकर निपष्क्षता से व्यवहार की कोई गुंजाइश नही-एमसी विमल -इसी शीर्षक के साथ हमने 27 जनवरी 2०18 को लेख प्रसारित किया था। अब इसके आगे की प्रस्तुति

गतांक से आगे——-
देश में जो कलह के उदाहरण है उससे आदमी के गुण दोषों का कुछ भी संबंध नहीं है। यह दो बुरे लोगों के बीच का भी झगड़ा नहीं है। छुआछूत की ये समस्या ये दो वर्गों की कलह की समस्या है। सवर्ण अछूत समाज के बीच का यह कलह है। किसी एक आदमी के शोषण का प्रश्न नही है। किसी एक आदमी पर हो रहे अन्याय का प्रश्न नहीं है। ये प्रश्न एक समाज वर्ग द्बारा दूसरे समाज वर्ग पर किए जा रहे शोषण का प्रश्न है। यह एक वर्ग द्बारा दूसरे वर्ग पर किए जा रहे अन्याय का प्रश्न है। यह वर्ग कलह सामाजिक दर्जा संबंधी कलह है। एक वर्ग ने दूसरे वर्ग से बर्ताव करते समय किस तरह से का बर्ताव करना है इस संबंध का यह कलह है। इस तरह के उपरोक्त जो उदाहरण जो बताये गये हैं, उससे जो मुख्य बात खुलेआम स्पष्ट हो जाती है, वह यह है कि आप उच्च वर्ग से बर्ताव करते समय बराबरी के नाते से बर्ताव किए जाने की बात करते हो। इसलिए यह कलह उत्पन्न होता है। अगर ये सच नहीं तो, तो रोटी का भोजन परोसने से, कीमती कपड़े पहनने से, जनेऊ पहनने से, पीतल या तांबे के बर्तन रखने से, घोड़े पर बारात ले जाने से उच्च वर्ग की कोई हानि नही होती है। आप इन सब बातों में अपनी ही जेब हल्की करते हो। फिर भी उच्च वर्ग में हमारे ऐसा करने से रोष क्यों? इस रोष की एक ही वजह है और वह यह है कि हम समता से जीने का बर्ताव उनके झूठे बड़प्पन को चोट पहुंचाता है। आप नीच हो, अपपवित्र हो ऐसी उनकी धारणा है। आप नीचे पायदान पर रहो तो वह आपको सुख पूर्वक जीने देंगे। यदि आपने अपने पायदान को छोड़ दिया तभी कलह का आरम्भ होता है, ये बात र्निविवाद सत्य है। उपरोक्त उदाहरण से एक और बात स्पष्ट हो जाती है कि छुआछूत कभी कभार की बात न होकर वह स्थायी है। यही बात यदि स्पष्ट शब्दों में हम कहें तो यह है कि सवर्ण और अछूतों के बीच का कलह स्थायी है और वह कई सदियों तक ऐसा ही रहेगा। इसकी वजह यह है कि जिस धर्म ने तुम्हे नीचे का स्थान दिया है कि वह धर्म उच्च वर्ग की धारणा के अनुसार सनातन है। और उस धर्म में किसी भी तरह का संसोधन समय अनुसार संभव नहीं है। आप आज जिस तरह से नीच हो उसी तरह स्थायी रूप से रहना होगा। इसका मतलब है कि सवर्ण और अछूतों में यह कलह स्थायी रूप से रहेगा। इस कलह से आपका छुटकारा किस तरह से हो, यह मुख्य प्रश्न है और इसी पर विचार करना है।
आप में से जिन लोगों को एक वर्ग के लोग जिस अवस्था में रखना चाहेंगे वैसा रहने के जो इच्छुक हैं उनके सेवा धर्म को स्वीकार कर जिन्हे जीवन यापन करना है उन लोगों को इस समस्या पर सोचने की जरूरत नहीं है। परंतु जिन्हे स्वाभिमान और सम्मान से जीना आवश्यक महसूस होता है, जिन्हे समता पूर्वक जीवन यापन करने की आवश्यकता महसूस होती है उन्हें इस समस्या पर विचार किए बगैर संतुष्टि नहीं है। किस तरह इस कलह से अपना बचाव किया जा सकता है? इसका विचार करने की उन्हें आवश्यकता है। कलह से हमारा बचाव कैसे होगा इस समस्या पर निर्णय लेना मुझे तो बहुत कठिन महसूस नहीं होता है। यहां पर इकट्ठा हुए आप सब लोगों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि वह यह है कि किसी भी कलह में जिसके पास सामथ्र्य होता है उसकी ही जीत होती है। जिसके पास सामथ्र्य नहीं वह विजय की आशा नहीं रह सकते हैं ये बात सभी ने अपने जीवन में अनुभव की है इसलिए उसके समर्थन में कोई भी सुबूत देने की आवश्यकता नहीं है।

इन तीन शक्तियों के बारे में विचार करने की जरूरत है

जिस प्रश्न पर आपको विचार विमर्श करना आवश्यक है वह ये है कि इस कलह से छुटकारा प्राप्त करने के लिए क्या आपके पास पर्याप्त समाथ्र्य है? इंसान को तीन तरह का सामथ्र्य मिला हुआ है। उसमे एक मनुष्य बल है, दूसरा संपत्ति बल है, तीसरा मानसिक बल है। क्या आपको लगता है कि इन तीन प्रकार की शक्तियों में कोई शक्ति आपके पास है?
1-मनुष्य बल
मनुष्य बल दृष्टि से देख्ो तो आप लोग अल्पसंख्या में हो ये बात स्पष्ट है, महाराष्ट्र प्रदेश में अछूत वर्ग की आबादी 1/8 है और वह भी संगठित नहीं है हमारे आसपास के जाति भ्ोद के फलस्वरूप उनमें संघ शक्ति का पूरा आभाव है हम संगठित तो है ही नहीं, परंतु हम इकट्ठा भी नहीं है और गांव कस्बों में बिखरे पड़े हैं इसी कारण से हमारी अल्पसंख्या का भी इसी तरह का लाभ आपातकाल में संकटग्रस्त है अछूतों की बस्ती को नहंी हो सकता।
2-धन बल
धन बल की दृष्टि से देख्ों तो आपकी वही लाचार अवस्था है आप लोगों के पास थोड़ा बहुत मनुष्य बल तो है, ऐसा कहा जा सकता है। लेकिन आप लोगों के पास धन बल कतई नहीं है। यह बात भी र्निविवाद रूप से सत्य है। आप लोगों के हाथ में व्यापार नहीं, उन्नति नहीं, नौकरी नहीं, ख्ोती भी नहीं है। जो कुछ भी दया स्वरूप आपको देंगे वही आपकी जीविका साधन है आपके पास आनाज नहीं है, आपके पास कपड़ा लत्ता भी नहीं है तो फिर आपके पास धन बल कैसे होगा? यदि आप पर अन्याय हो तो उसके विरोध में न्यायालय से न्याय की मांग करने की भी शक्ति भी आपके पास नहीं है। आप में से लाखों लोगों को न्याय का खर्चा उठाने की हैसियत न होने से, एक वर्ग के लोगों को द्बारा होने वाले अन्याय, अत्याचार को सहना पड़ता है।
3-मानसिक शक्ति
मानसिक शक्ति की तो इससे भी बड़ी कमी है। सैकड़ो वर्षों से उनके द्बारा हो रहे अन्याय, अत्याचारों को घृणा को चुपचाप सहते जाने से पलट कर जवाब देने की और प्रतिकार करने की आपकी हिम्मत नष्ट हो गयी है। आप लोगों को आत्मविश्वास, उत्साह एवं महात्वकांक्षा मर सी गयी है। आप सब लोग हताश, लाचार हो चुके हैं। निराशा और कायरता का माहौल सभी ओर छा गया है। हम कुछ भी कर सकते हैं इस तरह का विचार भी किसी के जहन में आता तक नहीं है।

लेखक एमसी विमल द्बारा बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर के भाषण मुक्ति कौन पथे से लिया गया है।

नोट- हमारा किसी भी वर्ग विशेष को ठेस पहुचाने का मकसद नहीं है। हमारा प्रयास भारत की एकता और अखंडता बनी रहे, के लिए ही एक छोटा सा प्रयास है।

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