गरीब परिवार से निकलकर भारत के इस लाल ने लोकतंत्र का किया था कुशल नेतृत्व, पढ़िए शास्त्री जी के जन्मदिवस पर विशेष

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न्यूज डेस्क। आज जहां पूरा देश दो अक्टूबर को राष्टपिता महात्मा गांधी की जयंती मना रहा है। वहीं दूसरी ओर हमारे देश के प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री की 116वीं जयंती भी मनायी जा रही है। धरती के लाल कहे जाने वाले शास्त्री जी के योगदान को भी भारत कभी भुला नहीं पायेगा। शास्त्री जे बेहद ही गरीब परिवार से थे, उनकी गरीबी से भी भारत के युवाओं को बहुत कुछ सीखने को मिलता है। शास्त्री जी का बचपन जिस गरीबी के साथ बीता, उसी गरीबी से निकलकर शास्त्री जी ने अपने आपको शिक्षित बनाया और देश का कुशल नेतृत्व भी किया। उनके जीवन के बारे में देश के हर युवा को जानना चाहिए।
जब देश पहुंच गया था भुखमरी के कगार पर
  • -ये बात उन दिनों की है जब साल 1965 में भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो गया था
  • -उस समय देश की बागडोर लाल बहादुर शास्त्री के हाथों में थी।
  • -युद्ध के दौरान देश में अन्न की कमी हो गई।
  • -देश भुखमरी की समस्या से गुजरने लगा था।
  • -तब शास्त्री ने अपना तनख्वाह लेना बंद कर दी थी।
  • -यहां तक उन्होंने अपने घर पर काम करने आने वाली बाई को भी काम पर आने से मना कर दिया था।
  • -पैसे बचाने के चक्कर में घर का सारा काम खुद से करने लगें।
संकट के समय अमेरिका ने भी दिखायी थी भारत को आंखे, शास्त्री जी ने इस तरह दिया था जवाब
  • -एक ओर देश खाद्यान्न की कमी से जूझ रहा था।

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  • -अमेरिका ने भी भारत को खाद्यान्न के निर्यात रोकने की धमकी दे दी थी।
  • -देश के लोगों से लाल बहादुर शास्त्री ने हाथ जोड़कर अपील की थी।
  • -अपील में कहा सभी लोग हफ्ते में एक दिन एक वक्त व्रत रखें।
  • -पूरे देश ने इस बात को माना और शास्त्री जी का सहयोग किया, शास्त्री ने आभार भी व्यक्त किया
  • -शास्त्री जी भी पीछे नहीं रहे और अपने घर में भी एक चूल्हा एक सप्ताह नहीं जलने दिया।
  • शास्त्री से जड़ी ये भी हैं खास बातें
बचपन में हो गयी थी पिता की मृत्यू
शास्त्री जी का जन्म दो अक्टूबर 1904 में यूपी के मुगल सराय में हुआ था, शास्त्री जी जब डेढ़ वर्ष के थे तब उनके पिता का निधन हो गया था। इसे बाद वह अपने चाचा के साथ रहने लगे, घर पर शास्त्री जी को सब नन्हे कहकर बुलाते थे।
पहनने को नहीं थे चप्पल, इस तरह से पार करते थे नदी
शास्त्री जी जब स्कूल जाने के योग्य हुए तो गरीबी की मार इतनी ज्यादा थी, उनके पास चप्पल और कपड़े तक नहीं थे। वह नंगे पैर कई मील पैदल चलकर स्कूल जाते थे। बताया जाता है कि रास्ते में एक नदी भी पड़ती थी उस नदी को पार करने के लिए शास्त्री जी के पास नाविक को पैसे देने के लिए नहीं होते थे तो वह अपने पयजामें से किताबे और कुर्ते को सिर में बांधकर नदी तैरते हुए पार कर जाते थे। हालांकि कई बार बड़े बुजुर्ग समझते भी थे।
16 साल की उम्र में छोड़ दी पढाई, गांधी जी के आंदोलन में हुए शामिल
शास्त्री जी जब 11 साल के थेे उन्होंने मन में ठान लिया था कि देश के लिए कुछ करना है। और 16 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी थी। पढ़ाई छोड़ने के बाद वह गांधी जी के असहयोग आंदोलन में शामिल हो गये थे।
इस तरह नाम में जुड़ा शास्त्री
बता दें कि लाल बहादुर शास्त्री के नाम में पहले शास्त्री नहीं जुड़ा था, वह काशी विद्यापीठ में शामिल हुए थे, यहीं से उन्हें स्नातक की डिग्री प्रदान की गयी थी। इस डिग्री का नाम ही शास्त्री था और यही नाम उनके नाम के आगे जुड़ गया। उनका पूरा नाम लाल बहादुर शास्त्री हो गया।
सात साल काटा जेल में
पढ़ाई छोड़ने के बाद महात्मा गांधी के आंदोलन में वह शामिल हो चुके थे, गांधी जी के कई आंदोलन में उन्होंने भूमिका निभायी, इस परिणाम भी उनको भुगतना पड़ा और उनको पूरे सात साल तक ब्रिटिश की जेल में बिताना पड़ा, जहां अंग्रेजो ने उनके साथ बहुत अन्याय भी किया।
प्रधानमंत्री बनने से पहले भी संभाल चुके हैं देश के कई विभाग
आजादी के बाद 1951 में वह दिल्ली आये कई बड़ी जिम्मेदारियों को संभाला, जिसमें उन्होंने रल मंत्री, परिवहन मंत्री, संचार मंत्री, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री, गृहमंत्री और नेहरू जी के बीमारी के बाद भी वह कई विभागों के मंत्री रहे।
देश में जब पड़ा सूखा तो दिया ये नारा
1964 में जब लालबहादुर प्रधानमंत्री बने तो उनके ही शासनकाल में 1965 में पाकिस्तान से युद्ध छिड़ गया, उस समय देश में भयंकर सूखा पड़ा और अमेरिका ने भी आंखे दिखा दी तब शास्त्री जी ने हिम्मत से काम लेते हुए देश का हौसला बढ़ाया, और जय जवान जय किसान का नारा भी दिया।
महात्मा गांधी को मानते थे अपना गुरू
राष्टपिता महात्मा गांधी को शास्त्री जी अपना गुरू भी मानते थे, उन्होंने उनका ध्यान रखते हुए कहा था कि सच्ची मेहनत करना ही सच्ची प्रार्थना है। शास्त्री जी और भी कई ऐसे विचारों को भी मानते थे जो महात्मा गांधी के विचारों से काफी हद तक मेल खाते थे। शास्त्री जी ने कहा था कि जो शासन करते हैं उन्हे देखना चाहिए कि लोग प्रशासन पर किस तरह की प्रतिक्रिया देते हैं, अंततः जनता ही मुखिया होती है।
यहां हुई थी 1966 में शास़्त्री जी मृत्यू
शास्त्री जी की मृत्यू 11 जनवरी 1966 को हुई थी। मृत्यू के समय वह ताशकंद में पाकिस्तान के साथ शांति समझौते पर करार करने गये थे। यहां इस करार के 11 घंटे के बाद उनकी मृत्यू की खबर आ गयी थी। उनकी मृत्य को आज भी देश के कई जानकार रहस्मय की तरह से देखते हैं, कई बार इस पर बड़े-बड़े सवाल उठाये गये लेकिन हुआ कुछ भी नहीं, रहस्य आज भी बरकरार है। हालांकि उनकी मृत्यू के बाद पूरा देश रो पड़ा था।
Posted By- Ravi gupta 

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