लखनऊ विश्वविद्यालय में एक साल से हो रहा था फर्जीवाड़ा, लेखाधिकारी बने रहे अंजान, चेक क्लोनिंग कर निकाला गया पैसा

लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय में कुलपति एसपी सिंह कार्यकाल में एक से बढक़र एक घोटाले और फर्जीवाड़े सामने आ रहे हैं। अभी फर्जी डिग्री और उसके सत्यापन के मामला ठंडा भी नहीं हुआ था और अब नया खेल सामने आ गया है। अब वित्तीय व्यवस्था में सेंध लग गयी है और पिछले एक साल से फर्जीवाड़ा जारी था लेकिन अधिकारियों से लेकर कुलपति एसपी सिंह को भी इस बात की भनक तक नहीं लगी। विश्वविद्यालय में लेखाधिकारी भुगतान कर रहे है जबकि नियमों के अनुसार उन्हें कोई भुगतान करने का अधिकार नहीं है उन्हें तो केवल जो भुगतान हो रहे है उन पर नजर बनाये रखने की जिम्मेदारी दी गयी है। इसके बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन अपनी मनमानी कर वित्तीय व्यवस्था भी अपनी सहुलियत के मुताबिक चला रहा है।
लखनऊ विश्वविद्यालय में जैसे नियम है उन्हें तोडऩे वाले भी वैसे ही है। विश्वविद्यालय के आला अधिकारियों की जानकारी के अनुसार विश्वविद्यालय में लेखाधिकारी को कोई भुगतान करने का अधिकार नहीं दिया गया है क्योंकि लेखाधिकारी भी स्थानीय लेखा निधि परीक्षण से तैनात हुये है। विश्वविद्यालय में वित्त की व्यवस्था को देखने के लिए दो तरफ से निगरानी की जाती है। पहली व्यवस्था के तहत स्थानीय लेखा निधि परीक्षण के सहायक निदेशक की ओर से निरन्तर ऑडिट किया जाता है।  जिसके लिए विश्वविद्यालय की ओर से शासन को भुगतान किया जाता है। दूसरा इसी विभाग से लेखाधिकारी के रूप में विश्वविद्यालय में अलग से बैठाया गया है। यह लेखाधिकारी का नियमों के अनुसार प्रतिदिन की ऑडिट में सहायता करना, एडवांस दिया जाना, उसकी वूसली करना और समायोजन कराना है। इसके साथ ही वह बैलेंस शीट तैयार करने और पेंशन प्रपत्र तैयार कराने का काम करते है। इसके साथ ही कैशियर की देखभाल की जिम्मेदारी भी उनकी बनती है लेकिन यहां पर लेखाधिकारी को वित्त अधिकारी तक का पद पर आसीन किया गया है। सूत्रों के अनुसार लेखाधिकारी उदय कुमार गुप्ता कैशियर कार्यालय की जांच करने नहीं गये है।
ये कहते है नियम
लखनऊ विश्वविद्यालय के वित्त विभाग के जानकार की मानें तो किसी भी फर्म के भुगतान को करने के लिए दो अधिकारियों के साइन होते है। पूर्व की व्यवस्था के अनुसार डिप्टी रजिस्ट्रार वित्त और वित्त अधिकारी के ही चेक पर साइन होते है लेकिन सूत्रों की मानें तो इस व्यवस्था को भी बदला गया है। डिप्टी रजिस्ट्रार वित्त ने बताया कि वह किसी भी भुगतान पर हस्ताक्षर नहीं करते है। इस पर वित्त अधिकारी संजय श्रीवास्तव से पूछा गया तो उन्होंने इसकी कोई जानकारी न होने की बात कही।
कुलपति ने गठित तीन सदस्यीय समिति
लखनऊ विश्वविद्यालय के बैंक खाते से कूटरचित चेक प्रस्तुत कर कपटपूर्ण आहरण किये जाने के प्रकरण का संज्ञान लेकर भविष्य में पुनरावृत्ति न होने देने के लिए विश्वविद्यालय में वर्तमान में चल रही लेखा व्यवस्था व प्रक्रिया का मूल्यांकन करने के लिए कुलपति प्रोण् एसपी सिंह ने समिति गठित कर दी गई है। इस समिति में कोषागार के अतिरिक्त निदेशक सेवानिवृत्त नरेन्द्र भूषण और भारतीय स्टेट बैंक की मुख्य शाखा के मुख्य सहायक केके सिंह और समन्वय अधिकारी लखनऊ विश्वविद्यालय के वित्त अधिकारी होंगे।
इन बिंदुओं पर जांच करेगी समिति
यह समिति इन बिन्दुओं पर जांच कर जांच आख्या एक सप्ताह के अन्दर कुलपति को प्रस्तुत करेगी। विश्वविद्यालय की लेखा पद्धति का क्रियान्वयन, विश्वविद्यालय में प्राप्ति व्यय के लिए प्रक्रिया एवं लेखांकन की प्रस्थिति की जांच करेगी। चौथे बिदुं में लेखांकन के लिए कम्प्यूटरीकरण की आवश्यकता और वर्तमान कपटपूर्ण भुगतान होने की कमियां और सुधार के लिए की जाने वाली कार्यवाही के साथ आंतरिक लेखा परीक्षा की व्यवस्था के बारे में भी जांच करेगी।
चेक क्लोनिंग कर निकाले गये रूपए
लखनऊ विश्वविद्यालय में 700 से लेकर 900 रुपये की जारी चेक की क्लोनिंग कर जालसाजों ने परिसर स्थित बैंक की मिली भगत से विश्वविद्यालय के खाते से करोड़ो रुपए निकाल लिये हैं। खास बात यह है कि जिन चेक की क्लोनिंग कर फर्मों को भुगतान किया गया हैए वह चेक बैंक की तरफ से उन्नीस वर्ष पूर्व जारी हुई थीए वर्तमान में वह चेक प्रचलन में भी नहीं है। कुलपति का आरोप है कि इस चेक की क्लोनिंग करके वर्तमान चेक के रूप में उसे तैयार कर भुगतान लिया गया। फर्मों का भी विश्वविद्यालय से कोई संबंध नहीं है। विवि के मुताबिक अप्रैल 2018 से मई 2019 के बीच 1 करो? 9 लाख 82 हजार 935 रुपये के 11 चेक के माध्यम से नकद का ट्रांसफर किया गया हैं।

वित्तीय व्यवस्था में जो गड़बड़झाला सामने आया है उसकी जांच के लिए समिति का गठन कर दिया गया है। इससे पहले डिप्टी रजिस्ट्रार और वित्त अधिकारी के साइन करने की व्यवस्था थी लेकिन जब से डिप्टी रजिस्ट्रार की कमी हुयी तो चेकों पर लेखाधिकारी और वित्त अधिकारी साइन करने लगे। इस नियम की कोई जानकारी नहीं कि डिप्टी रजिस्ट्रार वित्त और वित्त अधिकारी को ही साइन करना चाहिए यदि ऐसा नियम है तो उसे भी देखा जायेगा।
एनके पाण्डेय प्रवक्ता लविवि

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