अयोध्या मामले में 1045 पन्ने के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इतिहास से लेकर श्लोक तक का किया जिक्र

न्यूज डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर शनिवार को 1045 पन्नों में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने 929 पन्नों में अपना निर्णय सुनाया है। इसके अलावा बाकी पन्नें भी इसमें जुड़े हुए हैं। एक किताब जैसे दिखने वाले इस आदेश में इतिहास से लेकर सभी पक्षों की दलील विस्तृत रूप से शामिल किया गया है। इसकी भूमिका में दो पक्षों के बीच अयोध्या की 1500 गज जमीन का जिक्र किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय इतिहास से लेकर श्लोक तक का जिक्र किया है।
देश के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि विवादित 2.77 एकड़ जमीन रामलला विराजमान को दी जाए। मंदिर निर्माण के लिए 3 महीने में ट्रस्ट बने और इसकी योजना तैयार की जाए। चीफ जस्टिस ने मस्जिद बनाने के लिए मुस्लिम पक्ष को 5 एकड़ वैकल्पिक जमीन दिए जाने का फैसला सुनाया, जो कि विवादित जमीन की करीब दोगुना है। चीफ जस्टिस ने कहा कि ढहाया गया ढांचा ही भगवान राम का जन्मस्थान है और हिंदुओं की यह आस्था निर्विवादित है।
संविधान पीठ द्वारा 45 मिनट तक पढ़े गए 1045 पन्नों के फैसले ने देश के इतिहास के सबसे अहम और एक सदी से ज्यादा पुराने विवाद का अंत कर दिया। चीफ जस्टिस गोगोई, जस्टिस एसए बोबोडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एस अब्दुल नजीर की पीठ ने स्पष्ट किया कि मस्जिद को अहम स्थान पर ही बनाया जाए। रामलला विराजमान को दी गई विवादित जमीन का स्वामित्व केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगा।

फैसले की भूमिका में 1950 में अदालत द्वारा आयुक्त के पत्र को भी शामिल किया गया है। इस पत्र में शिवशंकर लाल ने कोर्ट के आदेश का पालन करने की बात कही है। उन्होंने कहा कि आदेश के बाद वह पहली 16 अप्रैल 1950 को विवादित स्थल पर गए और इसके बाद 30 अप्रैल 1950 को यहां का दौरा किया। शिवशंकर लाल इन दोनों दौरों का विस्तृत वर्णन किया है। यही नहीं अदालत ने भारतीय पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट को भी आदेश में शामिल किया गया है। इसके अलावा एक वाद में अपना दावा रखने के लिए संस्कृत के श्लोकों का भी जिक्र गया है।

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