कोमल है कमजोर नहीं, मां बनना ही सब कुछ नहीं, महिला के प्रति समाज को बदलनी होगी मानसिकता-अभिलाषा

जिस भारत देश में हम जमीन से उठकर चन्द्रमा तक पहुंच चुके हैं, टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में हम कई देशों को पीछे छोड़ रहे हैं उस देश में आजादी के 72 साल बाद भी समाज में नारी के प्रति लोगों की सोंच और नजरिया नहीं बदल सका है।
अभिलाषा चौधरी वरिष्ठ लेखिका
नारी सबकुछ सहते हुए भी आज समाज में महिलाओं ने अपनी एक से बढक़र एक भूमिकाओं का परिचय दिया है, वैज्ञानिक की दुनियां से लेकर देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति , मुख्यमंत्री तक के पदों पर महिलाएं भूमिका निभा रही हैं, यहां तक सुरक्षा एंजेसियों में शामिल देश की सुरक्षा व्यवस्था में भी महिलाओं का योगदान है, बावजूद यदि वह शादी होने के बाद बच्चा नहीं पैदा कर पाती है तो उसके बांझपन का ऐसा मजाक बनाया जाता है, मानो उसने कोई ऐसा क्राइम कर दिया हो जिसका कोई समाधान न हो, उस नारी के लिए अफसोस तो तब होता है जब उसके अपने ही परिवार के बांझपन को लेकर ताने देना शुरू कर देते हैं, जबकि ऐसा नहीं है कि पुरूषों में कोई कमी नहीं होती है। वैसे तो किसी दर्द को पेज पर नहीं उतारा जा सकता है। लेकिन थोड़ा सा ही सही उस दर्द का बयां करने की जरूरत होती है। क्योंकि समाज के भीतर छुपी खतरनाक मानसिकता और ताने टिप्पणी के चलते किस पीडि़त महिला को आत्महत्या की ओर ढकेल दे कुछ कहा नहीं जा सकता है। बांझपन को लेकर समाज के लोगों की आंखे खोल देने वाली अभिलाषा चौधरी की खास स्टोरी जिसे समाज के लोगों को पढऩा चाहिए।
हम महिला के जिस बड़े दर्द की बात कर रहे हैं उसे बांझपन कहा जाता है। आज सुख को बदलने के लिए कई तकीनीकों का इजात हो चुका है, लेकिन समाज में बांझपन को लेकर एक महिला प्रति जो लोगें की विक्षिप्त मानसिकता होती है उसको बदलने के लिए किसी भी तकनीक का निर्माण नहीं हुआ है।

बांझपन की शिकार महिला की समाज में कुछ ऐसी होती है स्थिति एक सच्ची कहानी

मैं भी एक नारी हूं जिस दर्द का जिक्र करने जा रही हूं उसको समाज में नाम बांझपन दिया गया है, जोकि समाज के अनुसार महिला के लिए बड़ा अभिशाप है जो इसकी शिकार महिला को न तो समाज जीने देता है न ही मरने देता है सवाल ये है क्या महिला एक बच्च पैदा करे तो ही समाज में उसकी अहम भूमिका होगी?  इस पर लिखने का साहस इसलिए किया क्योंकि कहीं न कहीं मैं भी आंशिक रूप से प्रभावित हुई हूं, एक महिला के दर्द को बहुत करीब से देखा है तब मेेरे सामने ऐसे दृश्य उभरे हैं जो मैने प्रत्यक्ष देखे हैं । बात तबकी है जब मेरी शादी नहीं हुई थी और मैने भी शादी व्याह को लेकर ढेरो सपने संजोए थे उन सपनों में शादी का मतलब एक सुखद जिंदगी का आगाज होना था। वक्त थोड़ा आगे बढ़ा मेरी शादी की भी चर्चाएं घर में होने लगी मानो लगा जैसे अब पीहर की अटखेलियां समाप्त होने को हैं। और जिम्मेदारियां का पथ मेरी ओर बढ़ रहा है। वक्त खिसक रहा था,  मेरे सपनों के साथ एक महिला के बांझपन का दर्द भी बढ़ रहा था, जिसे मैं देख तो रही थी। लेकिन महसूस नहीं कर पा रही थी।
जानवर से बद्तर समाज समझता है जिंदगी
बच्चे का ना होना जैसे उसके मरने से बद्दतर सजा थी। वो महिला इंसान तो थी लेकिन उस महिला की जब स्थिति को लेकर बात होती थी तो लगता था की जानवर से भी ज्यादा हालात उसके खराब थे। बच्चा नहीं था मानो कोई अस्तित्व नहीं हो दिन भर काम की थकान और घर के लोगों के तानों के बीच जिंदगी बोझिल होकर गुजर रही थी। यदि वो महिला खाना भी खाती तो लोग ताने देते कि खाकर क्या करोगी, इस खाने से तो तुम पेट तो भर लोगी लेकिन उस पेट बच्चा तो होने वाला नहीं है।
मां नहीं बन पायी वो लेकिन किसी को तो मां बनने का मौका दिया
मेरे सामने जो हो रहा था उससे मेरे मन में टीस उठती थी और सोचती थी कि समाज का देखो कैसा नजरिया है, और फिर सोचती थी की थी क्या हुआ अगर वो मां नहीं बन पा रही है तो जिसकी बेटी है उस महिला को तो मां बनने का मौका दिया है। किसी को  तो उस महिला की वजह से मां बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, फिर समाज इससे हटकर उस महिला के बारे में क्यों नहीं सोचता है , फिर क्या उसे ठीक से खुश रहने और हंसने का भी अधिकार नहीं है?
एक औरत सिर्फ मां नहीं होती है, और भी समाज में होते हैं रिश्ते
हालांकि ये सोचकर मुझे भी हिम्मत जरूर मिलती थी क्या समाज में एक महिला सिर्फ मां का ही रूप होता है? महिला तो किसी की बहन होती है, किसी की बेटी होती है, किसी की पत्नी होती है फिर भी मां न बन पाने से समाज क्यों कोसता है? सिर्फ इसलिए कि वह बांझ है? ये सोचकर मानसिक स्तर पर जितनी परेसानी होती थी उसको समाज में हमारे लोग कभी नहीं समझते थे।
मन को दुख पहुंचाकर दिया जाता है आर्शीवाद
सबसे ज्याद उस समय दुख होता है कि बांझपन के शिकार होने उस महिला के अपने ही जब आर्शीवाद भी देते हैं तो वह उसे एक तरह से ताना ही देते थे। जैस: …..बेचारी किश्मत की मारी है, इसको जल्दी से बेटा हो जाये भगवान उसकी सुन ले। हम कितनी भी तरक्की कर लें, कितनी भी मशीनरी तकनीक विकसित कर लें लेकिन एक महिला के प्रति इन विचारों को खत्म नहीं कर सकते हैं इसलिए अब सोच को भी बदलना होगा।
पढ़े लिखे लोग और भी ज्यादा करते हैं कटाक्ष
मैं इस बात से भी हैरत में थी कि समाज का जो शिक्षित वर्ग है वह भी उस महिला पर बातों बातों में कटाक्ष करने से बाज नहीं आते थे। मेरी शादी होने के बाद मेरा समय तो सुखद गुजर रहा था। हद तो तब हो गयी जब पीहर वाले भी उस महिला के दर्द पर मरहम लगाने से बचने लगे। मैंने देखा है उससे सब यही कहते बेटी तुम्हारी किश्मत है तुझे ही भोगना पड़ेगा।
वह औरत जहां से आती है वहां नहीं लौट सकती है
मैं ये सोचती थी कि कमाल की बात है यदि हम कोई दुकान से निर्जीव वस्तुत खरीदते हैं वह भी अपनी दुकान पर रिपेयर के लिए वापस जा सकती है, लेकिन एक औरत जहां से आती है वहां भी नहीं लौट सकती है। कितना मजबूर वजूद है एक औरत का कि जो मां बाप उसे पैदा करते हैं उसके बच्चा न पैदा कर पाने पर उसको उसी के हालातों पर छोड़ देते हैं।
गांवो में आज भी सजा के रूप में व्याप्त है बांझपन
मैं भी एक शिक्षित वर्ग से हूं मैने अक्सर देखा है कि शहरो में इस दर्द का निर्वारण हो जाता है, लेकिन गांवों में …..बांझपन …तो एक सजा के रूप में व्याप्त है।  ये दर्द सिर्फ उस औरत का नहीं है जिसका मैने जिक्र किया है, इससे अनगिनत महिलाएं गुजरती हैं। शायद आज मैं समाज से इतनी गुजारिश करती हूं कि हर औरत को सम्मान से रखे चाहे वह बच्चा पैदा करने में समर्थ हो या असमर्थ क्योकि वह भी प्यार और अपने पन की हकदार है। बगीजे में हम हजारो पेड़ लगाते हैं जरूरी नहीं हर पेउ़ पर फल लगे, कुछ पेड़ शीतल छाया भी देते हैं इसी तरह से हमें उस औरत की भावनाओं को सींचना चाहिए।
किश्मत का दोष नहीं होता बांझपन-डॉ ऑचल अग्रवाल
समाज भले ही बांझपन का शिकार महिला को किश्मत के नजरिए से देखता है लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं होता है, इस बारे में जानकार डॉक्टर भी मानते हैं कि इसका इलाज पूर्ण रूप से संभव है। इस बारे में दिल्ली के एक निजी अस्पताल की डॉक्टर आंचल अग्रवाल कहती हैं कि कोई भी महिला यदि गर्भधारण नहीं कर पा रही हैं, तो वह समाज में अकेली नहीं है, आज हर सात में से एक दंपती के साथ यह समस्या है. एक सामान्य धारणा है कि बांझपन महिलाओं की समस्या है, लेकिन बांझपन के हर 3 केस में से 1 का कारण पुरुष होता है, बांझपन के बारे में पता केवल तब नहीं चलता जब कोई दंपती काफी प्रयासों के बाद भी संतान सुख प्राप्त नहीं कर पाते, बल्कि कई लक्षण हैं जो बहुत पहले ही इस बारे में संकेत दे देते हैं।

Posted bywww.arnewstimes.in

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