अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सभी ने किया स्वागत, बनेगा राम मंदिर, मस्जिद के लिए भी मिलेगी जगह

न्यूज डेस्क। अयोध्या मामले में देश की सर्वोच्च अदालत की ओर से दिए गये फैसले के सभी पक्षो ने तहे दिल से स्वागत किया है। राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद मामले में पांच जजों की पीठ ने शनिवार को सर्वसम्मति से ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने विवादित भूमि पर मंदिर बनाने के लिए सरकार को आदेश दिया है। वहीं, मुस्लिम पक्ष के लिए अयोध्या में पांच एकड़ जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने फैसला सुनाने के बाद कहा हम अपना फैसला किसी की आस्था पर नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पर सुना रहे हैं।
मस्जिद का निर्माण किसी खाली जगह पर नहीं किया गया
कोर्ट ने तथ्यों का हवाला देते बाबरी मस्जिद का निर्माण किसी खाली जगह पर नहीं किया गया था। विवादित जमीन के नीचे एक ढांचा था और यह इस्लामिक ढांचा नहीं था। कोर्ट ने कहा कि पुरातत्व विभाग की खोज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने सबसे बड़े फैसले में अयोध्या की विवादित जमीन पर रामलला विराजमान का हक माना है. जबकि मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया गया है. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 जजों की विशेष बेंच ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया है।
शनिवार की सुबह दस साढ़े दस बजे पांच जजों ने पढऩा शुरू किया फैसला
शनिवार सुबह 10.30 बजे सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े, जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नज़ीर पहुंचे. पांच जजों ने लिफाफे में बंद फैसले की कॉपी पर दस्तखत किए और इसके बाद जस्टिस गोगोई ने फैसला पढऩा शुरू किया।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट न कही ये अहम बातें
-हम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
-बाबरी मस्जिद का निर्माण किसी खाली जगह पर नहीं किया गया था।
– विवादित जमीन के नीचे एक ढांचा था और यह इस्लामिक ढांचा नहीं था।
-कोर्ट ने कहा मंदिर तोडक़र मस्जिद बनाने की भी पुख्ता जानकारी नहीं है।
-पूरा मौका मिलने के बाद भी मुस्लिम पक्ष विवादित जमीन पर दावा साबित करने में नाकाम रहा है।
-कोर्ट ने 6 दिसंबर 1992 को गिराए गए ढांचे पर कहा कि मस्जिद को गिराना कानून का उल्लंघन था।
-कोर्ट ने विवादित जमीन पर रामलला का हक बताया।
-कोर्ट ने शिया वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े के दावों को खारिज कर दिया।
निर्मोही अखाड़े के इस दावे को कोर्ट खारिज किया
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक निर्मोही अखाड़े की ओर सुप्रीम कोर्ट में दलील पेश की गयी थी कि विवादित भूमि का आंतरिक और बाहरी अहाता भगवान राम की जन्मभूमि के रूप में मान्य है, हम रामलला के सेवायत हैं और ये हमारे अधिकार में सदियों से रहा है. निर्मोही अखाड़े ने अपनी दलील में कहा था कि हमें ही रामलला के मंदिर के पुनर्निर्माण, रखरखाव और सेवा का अधिकार मिलना चाहिए. अखाड़े के इस दावे को कोर्ट ने खारिज कर दिया और विवादित जमीन पर मंदिर निर्माण के लिए अलग से ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया।
शिया वक्फ बोर्ड का ये दावा हुआ खारिज
वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में शिया वक्फ बोर्ड की ओर से दलील पेश करते हुए कोर्ट को बताया गया कि मस्जिद मीर बाकी ने बनवाई थी, जो एक शिया थे, ऐसे में यह मस्जिद सुन्नियों को नहीं दी जा सकती, कोर्ट ने शिया वक्फ बोर्ड के इस दावे को भी खारिज कर दिया।
तीन माह में केन्द्र सरकार बनाये ट्रस्ट-सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को आदेश दिया कि वह तीन माह में एक ट्रस्ट बनाये और इसी ट्रस्ट की जिम्मेदारी होगी वह मंदिर बनाये। कोर्ट के इस आदेश के बाद यह पूरी तरह से साफ हो गया कि मंदिर बनना तय है। कोर्ट ने सरकार की जिम्मेदारी तय कर दी है। हालांकि ट्रस्ट बनने के बाद मंदिर निर्माण कितने समय में शुरू होगा इस पर अभी कुछ स्थिति साफ नहीं है।
पांच एकड़ जमीन में मस्जिद बनाने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मुस्लिम पक्ष को भी निराश नहीं किया, कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही किसी उचित जगह मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ जगह दी जाए। ऐसे में अब सरकार को तय करना है कि ये जमीन कहां पर दी जायेगी, और जमीन देने में कितना वक्त लग सकता है।
40 दिन में आया एतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने ये एतिहासिक फैसला 40 दिनों की कड़ी मेहनत के बाद दिया है। ऐसे में अब राम मंदिर का रास्ता साफ है। हालांकि कोर्ट ने कहा कि ये फैसला अस्था के आधार पर नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से स्पष्टï फैसला आने बाद से इस मामले के जानकारों ने कहा कि वर्षों से चल रहा हिन्दू मुस्लिम का विवाद समाप्त हुआ है, ये फैसला देश के लिए एक बड़ी नजीर है।
हाईकोर्ट का 2010 में आया था ये फैसला
सुप्रीम कोर्ट से पहले मायावती शासन काल में हाईकोर्ट ने भी 2010 में अपना फैसला दिया था। 30 सितंबर, 2010 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2.77 एकड़ जमीन का बंटवारा कर दिया गया था. कोर्ट ने यह जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान के बीच जमीन बराबर बांटने का आदेश दिया था। हाई कोर्ट के इस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसपर लंबी सुनवाई के बाद शनिवार (9 नवंबर) को देश की सबसे बड़ी अदालत ने अपना फैसला दिया है।

Posted By-Ravi Gupta

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