कोरोना वायरस ने ताजा कर दी 1947 की यादें, दिल्ली से यूपी बिहार तक मजदूरों ने किया पलायन

लखनऊ। देश में 1947 का वह दौर था जब हिन्दुस्तान और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ था। उस दौर में जो लोगों के पलायन की तस्वीरें सामने आयी थी आज वही दौर दिल्ली से शुरू हुए मजदूरों के पलायन ने यूपी, बिहार, राजस्थान तक दिखाया है। हाथों झोला झेला और सर गमछा लिए हजारों मजदूरों ने जिस कंडीशन में अपने अपने घरों को रूख किया उससे वाकई में 1947 की याद दिला दी। 1947 और 2020 में सिर्फ फर्क इतना है कि 1947 में पलायन एक देश से दूसरे देश में हो रहा था और 2020 में दिल्ली से यूपी बिहार और राजस्थान तक हुआ। बता दें कि देश की राजधानी दिल्ली से यूपी, बिहार और राजस्थान के हजारों मजदूरों की जीविका चलती है, ये बात छुपी नहीं है, लेकिन कठिन समय पर दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की सरकार ने यूपी के इन मजदूरों को सहारा नहीं दिया, न ही वहां की पुलिस ने इनकी मदद की। इस बात को दिल्ली से लखनऊ पहुंचे मजदूरों ने विचार से साझा किया और पूरे सफर में उनके साथ-साथ क्या हुआ वह दर्द भी बयां किया।
मजदूरों ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब से लॉकडाउन की घोषणा की है तब से दिल्ली में उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता रहा है, वह जिन कंपनियों व बड़े लोगों के घरो या उनकी फैक्टी में काम कर रहे थे उनके मालिकों ने चंद रूपऐ देकर उन्हें दिल्ली से भागने पर मजबूर कर दिया। मजदूरों ने कहा कि जो मालिकों के काम को वह आगे बढ़ा रहे थे उन्हीं मालिकों ने उनका सहयोग नहीं किया, न ही उन्हें घर वापस भेजने में मदद की । इस बात की शिकायत जब दिल्ली सरकार के हुक्मरानों से की गयी तो उन लोगों ने कोई सुनवाई नहीं की। मजदूरों में कई ऐसे लोग भी थे जो शिक्षित भी थे उन्होंने अरविंद केजरीवाल के बारे में कहा कि हम तो समझ रहे थे कि वह हमारे यूपी के नोएडा के रहने वाले हैं इसलिए यूपी वालों की मदद जरूर करेंगे लेकिन शिकायत के बाद भी उन्हें कोई शरण नहीं मिली। ऐसे में उन्हें बाल बच्चों के साथ दिल्ली से पैदल का ही रास्ता अपनाना पड़ा। मजदूरों ने बताया कि दिल्ली पुलिस के लोगों ने भी उनसे बहुत अमानवीय व्यवहार किया और जब दिल्ली पुलिस से उत्तर प्रदेश के बॉर्डर तक ही छोड़ देने के लिए मदद मांगी गयी तो उन्होंने भी कोई सहारा नहीं दिया। पैदल चलकर आये मजदूरों ने कहा कि हमने अपने पूरे जीवन में ऐसा दौर नहीं देखा। एक केबिल बनाने वाली कंपनी में काम कर हरे अरविंद यादव ने और उनके साथियों ने कहा कि इतिहास में 1947 दौर पढ़ा जरूर था लेकिन आज हकीकत में देख लिया।
दिल्ली से बहराइच की ओर जाने वाले लखनऊ पहुंचे मजदूरों ने बताया कि दिल्ली की सड़कों पर उनके साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार हुआ जिसे वह कभी जीवन में भूल नहीं सकते हैं। मजदूरों ने बताया कि पुलिस ने उनको एक स्थान पर बैठने नहीं दिया। थक कर यदि वह कहीं बैठ भी जाते थे तो पुलिस उनको दुत्कार कर भगा देती थी। मजदूरों ने वह जख्म भी दिखाये जो पुलिस ने अपने बेंत से पूरी बर्बता के साथ उन्हें दिए थे। उन्होंने कहा कि पुलिस बेवजह गालियां देकर उन्हें आगे बढ़ने का बोल रही थी।
यूपी की सीमा क्रास करते ही मिली राहत
मजूदरों ने बताया कि जब वह पैदल चलकर किसी तरह यूपी की सीमा में घुसे तो तब जाकर उन्हें थोड़ी बहुत राहत मिली । उन्होंने बताया कि रास्ते में यूपी पुलिस के जवानों ने उनको पीने का पानी दिया और कुछ बिस्कुट दिए उसके बाद राहत मिली। फैजाबाद के रहने वाले मजदूर राकेश मौर्या ने बताया कि एक पुलिस वाले ने उन सबके लिए शुक्रवार की रात्रि तीन बजे रूकने का साधन मुहैया कराया, और सब्जी पूड़ी भी खाने को दिया।
लखनऊ पहुंचे मजदूरों की संख्या देख पुलिस भी हैरान
दिल्ली से लखनऊ पहुंचे हजारों मजदूरों की संख्या देखकर पुलिस भी हैरान थी। मजदूरों की संख्या से ही पता चल रहा था कि दिल्ली के जिम्मेदार लोगों ने उनको रोकने की बजाये वापस लौट जाने के लिए ही मजबूर किया होगा। लखनऊ पुलिस कर्मियों ने भी इन मजदूरों की व्यवथा को सुना तो भी यही सच सामने आये कि उन्हे दिल्ली में लॉकडाउन की घोषणा के बाद रूकने की अनुमति नहीं दी गयी और केजरीवाल सरकार सोती रही।
मजदूरों ने कहा कि हम केजरी वाल वोटर नहीं थे
मजदूरों ने कहा कि हम मुख्यमंत्री केजरीवाल के यदि वोटर होते तो शायद हमें भी पनाह मिल जाती। लेकिन हम तो ठहरे मजदूर तो आखिर कहां जाते। उन्होंने कहा कि हम तो दिल्ली में ही काम करते हैं वहीं रूकना चाहते थे जब कोई साधन नहीं था तो मजबूरी में पैदल चलने को मजबूर हुए।
लखनऊ में डीजीपी और कमिश्नर ने संभाला मोर्चा
काफी संख्या में दिल्ली से लखनऊ पहुंचे मजदूरों की स्थिति को देखते हुए यूपी के डीजीपी एचसी अवस्थी और कमिश्नर सुजीत पाण्डेय मजदूरों की स्थिति का जायजा लेने पहुंचे। कई मजदूर ऐसे भी जो पूर्वाचंल के रास्ते से लखनऊ पहुंच रहे थे। उनको पुलिस कर्मियों की मदद से चारबाग स्टेशन व कैसरबाग बस स्टेशन पर पहुंचाकर रवाना किया गया। बता दे कि दिल्ली से आ रहे मजदूरों को मुख्यमंत्री ने जिन बसों को लेने लिए भेजा था उसमें अधिकांश बसों ने मजदूरों को सीतापुर रोड आईआईएम के पास ही उतार दिया था। इस स्थिति में मजदूरों को अपने जिले के मार्ग पर जाना जरूरी था। लेकिन आगे का साधन न होने के कारण उनको काफी परेशानी उठानी पड़ी।

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