भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय ने मनाया दीक्षांत समारोह, राज्यपाल ने कहा महान संगीतज्ञ बनने के लिए अभ्यास जरूरी

लखनऊ। कला, संगीत और साहित्य न केवल किसी राष्ट्र की पहचान बनते हैं, बल्कि यह स्वयं जीवन का उत्सव बन जाते हैं। भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृति है तथा समय के साथ चलते रहना भारतीय संस्कृति की सबसे अनूठी बात है। ये बात राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने कही। श्रीमती पटेल मंगलवार को भातखण्डे संगीत संस्थान अभिमत विश्वविद्यालय, के नवें दीक्षान्त समारोह में विद्यार्थियों को पदक और उपाधि प्रदान कर रही थी। इस दौरान उन्होंने कहा कि संगीत एक साधना है तथा संगीत आत्मा की भाषा है। अच्छा संगीत, शब्द और भाषा से परे है। इससे मानव को सुख, उल्लास तथा दिव्यानन्द की अनुभूति होती है। राज्यपाल ने प्रसन्नता व्यक्त की कि भातखण्डे संगीत संस्थान अभिमत विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश का एकमात्र संगीत संस्थान है, जिसे अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है। उन्होंने कहा कि इस संस्थान में देश-प्रदेश के साथ ही दूसरे देशों से भी विद्यार्थी भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्रहण करने आते हैं। उन्होंने कहा कि संस्थागत शिक्षा अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है। इससे एक बुनियाद तैयार होती है और विद्यार्थियों को अपनी कला की प्रगति के लिए दिशा मिलती है। किसी भी कला के दीर्घ प्रभाव के लिए उसके बुनियादी तथ्य एवं शास्त्र सीखने आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि नींव जितनी पक्की होगी, उतनी ही इमारत मजबूत होगी।
आनंदीबेन पटेल ने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि पूर्वजों से मिली सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान प्रकट करें। संगीत, नृत्य और नाटक सभी के लिए बहुत अधिक अनुशासन और रियाज की जरूरत होती है, क्योंकि कड़ी मेहनत एवं अभ्यास से ही इन कलाओं में महारत हासिल की जाती है। उन्होंने कहा कि हमारे महान संगीतकार घण्टों समय अभ्यास में ही बिताते हैं तभी उनको महान कहा जाता है। उन्होंने कहा कि हमारे कलाकारों और संगीतज्ञों को नई पीढ़ी के युवाओं में भारतीय संस्कृति और कला के प्रति सम्मान उत्पन्न करने और उन्हें शास्त्रीय संगीत व नृत्य सीखने के लिये प्रेरित करना होगा।
इससे पहले राज्यपाल ने आज संविधान दिवस के अवसर पर समारोह में उपस्थित लोगों को संविधान में उल्लिखित कर्तव्यों को याद दिलाते हुए कहा कि मूल कर्तव्यों के प्रति जागरूकता एवं संवेदनशीलता बढाने को प्राथमिकता दिया जाना आवश्यक है। मूल कर्तव्यों का पालन करने से ही अधिकारों का भी संरक्षण होगा क्योंकि मूल अधिकार व मूल कर्तव्य एक दूसरे के पूरक हैं। इस अवसर पर मुख्य अतिथि एवं प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना पद्मभूषण डॉ. उमा शर्मा, विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. श्रुति सडोलीकर काटकर, कार्यपरिषद एवं विद्यापरिषद के सदस्यगण, शिक्षकगण एवं विद्यार्थी भी उपस्थित थे।

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