पत्थरों से निकले जीवाणु से लहलहायेगी गेहूं की फसल,बीबीएयू की खोज, सभी गुणों से युक्त हैं ये जीवाणु और फंफूद

-अन्ना हजारे के गांव रालेगढ़ सिद्धि के पथरीले इलाकों से पत्थर के टुकड़ों में हुई खोज
लखनऊ। बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, के पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर राणा प्रताप सिंह (डीन एकेडमिक) एवं उनके दो शोध छात्रों पवन कुमार यादव और रोली मिश्रा ने फसलों की वृद्धि और विकास में सहायक जीवाणु और फफूंद की खोज की है। उन्होंने महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित अन्ना हजारे के गांव रालेगढ़ सिद्धि के पथरीले इलाकों से पत्थर के टुकड़ों और इनसे लगी मिट्टी को एकत्र कर इनसे कुल 21 सूक्ष्मजीवी निकाले, जिनमें दस जीवाणु तथा ग्यारह फंफूद समूह थे। इन सूक्ष्मजीवों की पहचान बैसिलस स्यूडोमोनास और पैनक्रोबैक्टर जीवाणु के रूप में तथा एस्परजिलस, पेनिसिल्लिअम और ट्राइकोडर्मा फफूँद के रूप में की गयी। इन सूक्ष्मजीवों में सूखा, मिट्टी की विषाक्ता और खारेपन को सहने की अपार क्षमताएं मिलीं। इन्हें गोबर और गुड़ से बनाए गए कणिकाओं में डालकर गेहूं उगाने के लिए प्रयोग किया गया तो फसलों के उपज में रासायनिक खाद युरिआ और डी.ए.पी. की तुलना में करीब 20 फीसदी बढ़ोतरी पाई गयी। वर्तमान में रासायनिक उर्वरकों और रासायनिक कीटनाशकों के अनियंत्रित उपयोग के कारण खेती योग्य भूमि को किसान नष्ट कर रहा है, उसके परिणामस्वरूप खाद्य और पानी विशाक्तता कीटनाशक और भारी धातुओं से दूषित हो रहें हैं।
बाजार में उपलब्ध जैव कीटनाशकों की क्षमता है कम
हालांकि इस समय कुछ जैविक खादें और जैव कीटनाशक बाजार में उपलब्ध हैं, परन्तु उनकी क्षमता कम होने के कारण विषम कृषि परीस्थित की, जलवायु एवं परिवर्तन की परीस्थितियों में पौध वृद्धि एवं रोगाणु शोधन न कर पाने के कारण मजबूरी में किसानों को यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों एवं अनेक तरह के जहरीले कीटनाशकों का उपयोग करना पड़ता है। पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देने वाले जीवाणुओं और फफूंद में भोजन और पर्यावरण की गुणवत्ता के साथ समझौता किए बिना उत्पादकता बनाए रखने की क्षमता होती है। इसलिए हमें अधिक प्रभावी जैव उर्वरकों एवं जैव रोगरोधियों की आवश्यकता है, जो प्रभावी रूप से विभिन्न भौतिक और रासायनिक कृषि जलवायु परिस्थितियों में काम कर सकें । वे जीवाणु जो सूखा, अधिक तापमान, जलवायु परिवर्तन, कृषि भूमि क्षरण, लवणता और कीटनाशकों के विषाक्तता को सहन करने में सक्षम हैं, वे भविष्य में प्रभावी जैव उर्वरक साबित हो सकते हैं।
सभी गुणों से युक्त है जीवाणु और फंफूद
प्रो. राणा ने बताया कि हमारे अध्ययन बताते हैं कि हमने पत्थरों से जो जीवाणु और फफूंद निकाले हैं, उनमें ये सभी गुण हैं। ये सभी प्रकार की कठोर स्थितियों में पौधे के विकास का समर्थन कर सकते हैं और फसलों की उत्पादकता को प्रभावी ढंग सेे बढ़ा सकते हैं। ये जैव फसल प्रेरक अपने बहुमूल्य गुणों के कारण टिकाऊ कृषि की आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम होंगे तथा इनके उपयोग से बंजर भूमि के उपयोग की संभावना भी बढ़ेगी। शोध में पाया है कि ये सूक्ष्मजीव जहरीले रासायनिक कृषि रोगनाशियों की उपस्थिति में भी पौधों की उपज बढ़ाते हैं और इनकी विषाक्तता को कम करते हैं। इन जीवाणुओं को कार्बनिक वाहक (ग्रन्योलों) में डाल देने से इनकी कार्यक्षमता रासायनिक खादों से बेहतर पाई गयी है। जैविक फार्मूला कम लागत में फसलों के जैविक उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान दे पाएगा।
Posted by- Amrita Varma

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