New education policy को मंजूरी लेकिन कैसा होगा सिलेबस और बच्चों के हाथ में कब पहुंचेगा, जानने के लिए पढिए

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित कैबिनेट की मीटिंग के दौरान नई शिक्षा नीति पर आखिरकार बुधवार को फाइनल मोहर लगा दी गयी। पिछले चार सालों से कड़ी मेहनत के बाद इस नीति को तैयार कर बुधवार को कैबिनेट में पेश किया गया और मंजूरी भी दे दी गयी है। नई नीति की मंजूरी के बाद भी अभी ऐसे तमाम सवाल हैं जिनका जवाब आना जरूरी हैं।

नई शिक्षा नीति के तहत कब से पढ़ेंगे बच्चे?

नई शिक्षा नीति को मंजूरी मिलने के बाद अब इस नीति को जमीन स्तर पर कब उतारा जायेगा और बच्चों के पढ़ाई का पैटर्न क्या होगा, शिक्षकों को इसके लिए क्या फिर से प्रशिक्षण दिया जायेगा, तो जानकार मानते हैं कि 34 साल पुरानी ​शिक्षा नीति में बदलाव किया जाना मोदी सरकार का यह ऐतिहासिक फैसला है, लेकिन अभी इसको अमल में लाने के लिए तीन से चार साल का वक्त लग सकता है।

कब तैयार होंगी नई किताबें?

नई शिक्षा नीति को मंजूरी मिलने के बाद क्या ओवरआॅल सिलेबस में बदलाव हो जायेगा क्या? जानकार मानते हैं कि नई शिक्षा नीति के तहत ओवरआॅल सिलेबस में बदलाव नहीं होगा लेकिन ओवरआॅल सिलेबस अपडेट जरूर किया जायेगा। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के ​सिलेबस को रोजगारपरक रूप से तैयार किया जायेगा। इस बारे में एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत मानते हैं कि बहुत तेजी से इस पर कार्य किया जाये तो दो साल का वक्त लग सकता है।

6 से 8 माह वक्त लगेगा पाठ्यक्रम तैयार होने में

नई शिक्षा ​नीति के तहत सिलेबस तैयार करने के लिए लगातार कार्य किया गया तो 6 से 8 माह का वक्त सिलेबस तैयार करने में लग सकता है। फिर इसे अमली जामा पहनाने के लिए किताबों के लेखन और तैयार होने में ढाई-से तीन साल का समय लग सकता है। छह महीने प्रकाशन में और इसके बाद आने वाले सत्र से किताबों को स्कूलों में पढ़ाने का काम शुरू हो सकेगा।

क्या होना चाहिए?

भारत में भी शिक्षाविदों का मानना है कि हर पांच साल में बच्चों की किताबों की समीक्षा, उसमें समय के अनुसार बदलाव, नए ज्ञान का समावेश होना चाहिए। हर दस साल में शिक्षा नीति में बदलाव होना चाहिए। नए सिरे से पाठ्यचर्या की रूपरेखा, पाठ्यक्रम का निधारण होना चाहिए। खुद जेएस राजपूत मानते हैं कि दुनिया के देशों में दो-तीन साल के भीतर वहां की शिक्षा, शिक्षा के पैटर्न, पाठ्यपुस्तकों में बदलाव हो जाता है। ऐसे में 2025—26 तक वक्त लग सकता है जब बच्चों के हाथो में किताबें पहुंच जायेंगी।

चार—चार साल पर सिलेबस का अपडेट होना जरूरी

नई शिक्षा नीति के तहत प्रोफेसर मानते हैं कि हर चार से पांच साल में सिलेबस का अपडेट होते रहना बहुत जरूरी है, क्योंकि जिस तरह से ज्ञान विज्ञान और टेक्नोलॉजी के साथ देश का इतिहास बदल रहा है, उन सब बातों को सिलेबस में अपडेट करना बहुत जरूरी है।

स्मृति ईरानी ने उठाया था मुद्दा, लग गये चार साल

वर्तमान शिक्षा नीति का ड्राफ्ट तैयार कराने का जिम्मा स्मृति ईरानी ने उठाया था। पूर्व कैबिनेट सचिव सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में कमेटी का गठन भी हो गया। इसमें जेएस राजपूत सरीखे अन्य भी रहे। समिति ने रिपोर्ट दी, लेकिन केंद्र सरकार ने व्यापक सुझाव लेने का मन बनाया। मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर बने। जावड़ेकर ने इसे पूर्व इसरो वैज्ञानिक, राज्यसभा सांसद डॉ. कस्तूरी रंगन की अध्यक्षता में समित बनाकर उसे सौंप दिया। इस समिति की सिफारिशें भी काफी पहले से मंत्रालय के पास पड़ी रही। अब जाकर मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कैबिनेट में मसौदे को पेश करके मंजूरी दिलाई।

2003 में शिक्षा के भगवाकरण का लगा आरोप

डॉ. मुरली मनोहर जोशी मानव संसाधन विकास मंत्री थे। शिक्षाविद जोशी ने अपनी देखरेख में नए पाठ्यक्रम की एक रुपरेखा, नया पाठ्यक्रम, नई किताबों का लेखन कराया। 2003 तक देश के छात्र नई पाठ्यपुस्तक पढ़ने के लिए पा सके। शिक्षा के भगवाकरण का आरोप लगा। 2004 में केंद्र सरकार बदल गई। मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने शिक्षा विद प्रो. यशपाल के मार्ग दर्शन में नई पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम, किताब लेखन का काम शुरू कराया। अर्जुन सिंह का मुख्य उद्देश्य शिक्षा के भगवाकरण का था।  इसलिए उन्होंने अपने लेखकों द्वारा निर्धारित भगवाकरण के अंश किताबों से हटवाए, 1999 तक चल रही पुरानी किताबों के बड़े अंश को शामिल किया और नई किताबें छात्रों को मिल गई।

कक्षा में नियमित शिक्षकों की मौजूदगी सरकार की जिम्मेदारी

कक्षा में छात्र और नियमित शिक्षकों की मौजूदगी सरकार की जिम्मेदारी है। साल 2000 से केंद्र सरकार देश की कक्षाओं में 40 छात्रों के पीछे एक नियमित शिक्षक का पैमाना मानकर चल रही है। 2005 में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने भी इस पर जोर दिया था। इसके बाद कपिल सिब्बल, स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर और अब रमेश पोखरियाल निशंक हैं। दो दशक बाद भी केंद्रीय विद्यालयों में छात्र और शिक्षक का एक शिक्षक के अनुपात में 50 से अधिक छात्र हैं। राज्यों के प्राथमिक विद्यालयों, माध्यमिक स्तर के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में यह अनुपात और भी मानक के अनुरूप नहीं है। नियमित शिक्षकों के पद खाली हैं।

आसान नहीं होगा पीएचडी की डिग्री लेना

नई शिक्षा नीति के अमल में आने के बाद सभी विश्वविद्यालय शिक्षा की सामग्री, उसके मानक के लिए एक सूत्र में बंध जाएंगे। यह अच्छा प्रयास है। जबकि पहले नागालैंड में एक ऐसा भी विश्वविद्यालय चर्चा में आ चुका है जो तीन साल के भीतर 500 लोगों को पीएचडी की डिग्री दे चुका है। राजस्थान की झुनझुनू में स्थित सिंघानिया यूनिवर्सिटी समेत तमाम पर डिग्री बिकने जैसे गंभीर सवाल उठ चुके हैं।

राष्ट्रीय नियामक आॅथरिटी बनने का रास्ता साफ

नई नीति के बाद उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक राष्ट्रीय नियामक अथॉरिटी बनने का रास्ता साफ हो रहा है। भारतीय उच्चतर शिक्षा परिषद (एचईसीआई) दमदार भूमिका में आएगा। राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामक परिषद (एनएचईआरसी) के गठन से कई विसंतियां दूर होने की संभावना है।

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